चूरू शहर की असाधारण हवेलियां व् छत्तरियाँ

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चुरू शहर  राजस्थान के थार रेगिस्तान के मुहाने पर  बसा एक छोटा सुप्त सा शहर है जिसे थार रेगिस्तान का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है। यह स्थान काफी पुराना है और करीब ईस्वी ११०० से इस जगह लोग रहते थे , स्थान यह स्थान काफी पुराना है और करीब ईस्वी ११०० से इस जगह लोग रहते थे , इस की विधिवत स्थापना  ईस्वी  1620 में जाट सरदार – चुरू ने की थी और बाद में इसे ईस्वी 1871 में  बीकानेर के राठौर राजाओं ने अपने अधिकार में ले लिया था।

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यह शहर 18 वीं शताब्दी के पहले ही  कारवां व्यापार मार्ग पर था जब मारवाड़ी व्यापारियों ने मध्य एशिया, ईरान, अफगानिस्तान, नेपाल, तिब्बत, बर्मा और थाईलैंड में घोड़े, रेशम, मलमल,  हाथी दन्त , अफीम, ऊन और मसालों का व्यापार करते हुए खुद को स्थापित किया था। खुद राजपूत और मुगल सेनाओं के साथ पलायन करके,  एक स्थान से दूसरे स्थान तक माल पहुंचने का बीमा  की स्थापना , बैंकिंग प्रणाली स्थापित की और काफी संम्पन्न हुए  , यहाँ तक कि शाही परिवारों ने उन्हें राज्य के लिए ऋण के बदले में राजस्व एकत्र करने के अधिकार दिए। साधारण भोजन की आदतों वाले इन मारवाड़ी लोगों ने अपने हवेलियों को  भव्ये और अलंकृत कर के अपनी संपत्ति का प्रदर्शन किया।

Churu haveli outer wall

Churu haveli outer wall

हवेलियाँ एक या दो आंगन के चारों और सटी हुई कई कमरों वाली संरचना   जिसमें डेढ़ फीट मोटाई  वाली छोटे  पत्थरों की दीवारों के साथ छोटी-छोटी खुली खिड़कियां होती  हैं जो छिद्रित पत्थरों की स्क्रीन से ढकी होती है , छत पर न्यूनतम 15 फीट की ऊँचाई वाले कमरे जो कि चूना प्लास्टर  के साथ समतल की जाती है , स्थानीय उपलब्ध खुरदरी सतह पर चित्र बनाना संभव नहीं था। पत्थरों पर  चिकनी सफेद सतह का निर्माण किया गया था, प्राकृतिक पत्थर या वनस्पतिओं  से प्राप्त रंगों की विविधता में चित्रों का निर्माण किया गया था, कई स्थानों पर सोने , शीशा और दर्पण में व्यापक काम किया गया था कांच का सामान उस समय बेल्जियम से मंगवाया जाता था  जो चूरू हवेलियों में ईस्वी 1840 से ईस्वी 1950 तक काम किया गया था ।

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34748190910_b9f3a4f91a_zइन हवेलियों में बैठक (मेहमानों के लिए स्वागत स्थान), नोहरा (सेवा क्षेत्र), दुकानें , मेहमानो के ठहरने के कमरे स्वामी परिवार के निजी इस्तेमाल और महिलओं के कमरे बिलकुल अलग होते है | इसके अलावा धर्मशालाएं (कारवां सराय), मंदिर, समाधियां स्मारक, छत्रियां , बाग़ बगीचे (आनंद उद्यान) और गौशालाएं (मवेशी आश्रय) कुओं और पानी के स्त्रोत भी बनाए गए थे।

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अधिकांश इमारतों की बाहरी और आंतरिक दीवारों पर चित्रित भित्तिचित्रों की उपस्थिति इस क्षेत्र में चित्रित इमारतों का एक अनूठा संग्रह है। सैंकड़ों खूबसूरत हवेलियों , मंदिरों, छत्तरी , धर्मशालाओं (सराय), , कुओं और टंकियों के बीच बारीक से बारीक भित्ति चित्रों का एक दुर्लभ संकलन है ।

Pillars Italian and Indian style

Pillars Italian and Indian style

इन चित्रों में जीवंत शैली, फैशन शैली, आभूषण, दैनिक जीवन की गतिविधियों, लोक कथाओं, शासकों, युद्ध नायकों, हिंदू देवी  और देवताओं, घटनाओं, ट्रेन, कारों, जानवरों, ब्रिटिश शासकों और यहां तक कि उस समय के  फिल्म अभिनेताओं को भी चित्रित किया गया है।

Gold Silver and glass work

Gold Silver and glass work

भारत में अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी की  स्थापना के बाद और व्यापार समुंद्री मार्ग से शुरू होने पर  मारवाड़ी व्यापारियों ने कलकत्ता और मध्य भारत के अन्य स्थानों की और पलायन  करना शुरू कर दिया और  चूरू में अपने परिवारों के लिए हवेलिओं पर  खर्च किया और समय के साथ वे बिखरे और कहीं और बस गए।

मारवाड़ी व्यापारी की समाधी छत्तरी

मारवाड़ी व्यापारी की समाधी छत्तरी

इनमें से कई हवेलियाँ उचित देखभाल के अभाव में जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हैं लेकिन फिर भी कोई भी व्यक्ति अपने गौरवशाली अतीत को देख सकता है

मारवाड़ी व्यापारी की समाधी छत्तरी

मारवाड़ी व्यापारी की समाधी छत्तरी

ये चित्रित इमारतें क्षेत्र के लिए अद्वितीय हैं और न केवल राष्ट्रीय बल्कि अंतर्राष्ट्रीय मान्यता के योग्य हैं।

अनिल राजपूत
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